औपनिषदिक वचन: ईशावास्यमिदं सर्वं …

ईशोपनिषद् ग्रंथ में मनुष्य को भौतिक संग्रह करने की अपनी लालसा पर नियंत्रण करने का उपदेश अधोलिखित मंत्र के माध्यम से दिया गया है:

ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् ।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् ।।

(ईशोपनिषद्, मन्त्र 1)

जिसका सार कुछ यूं है: जड़-चेतन प्राणियों वाली यह समस्त सृष्टि परमात्मा से व्याप्त है । मनुष्य इसके पदार्थों का आवश्यकतानुसार भोग करे, परंतु ‘यह सब मेरा नहीं है के भाव के साथ’ उनका संग्रह न करे ।

मुझे इस मंत्र के व्याख्याकारों द्वारा दिये गये अर्थों में पूर्ण साम्य नहीं दिखा । मैं दो-तीन का उल्लेख कर रहा हूं । ‘The Ten Upanishads’ नामक पुस्तक में श्री पुरोहित स्वामी एवं डब्ल्यू. बी. यीट्स ने संक्षेप में लिखा हैः ‘Whatever lives is full of lord. Claim nothing; enjoy, do not covet His property.’

श्रीमद् ए. सी. भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद ने उक्त मंत्र का अर्थ दिया हैः ‘इस ब्रह्मांड के भीतर…

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“This solves everything: It is either all unreal or it is all Real. If it is unreal, you can easily renounce it; you cannot own something that is unreal. If it is all Real, then that is what you are and there is nothing to renounce.”
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